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मन की अशांति को शांत करने के लिए उपाय

मन की अशांति को शांत करने के लिए  उपाय आज़माएँ: 1.🕉️ साँस पर ध्यान (प्राणायाम)**: 5-10 मिनट के लिए शांत स्थान पर बैठें। गहरी साँस लें और धीरे-धीरे छोड़ें। साँस पर ध्यान केंद्रित करने से मन शांत होता है। अनुलोम-विलोम या भ्रामरी प्राणायाम भी प्रभावी हैं।🕉️ 2. 💞🕉️ध्यान (मेडिटेशन)💖: रोज़ 10-15 मिनट ध्यान करें। शुरू में साँस या मंत्र (जैसे 'ॐ') पर ध्यान लगाएँ। यदि विचार आएँ, तो उन्हें बिना जज किए जाने दें। आपकी उम्र (73 वर्ष) को ध्यान में रखते हुए, कुर्सी पर बैठकर छोटे सत्र करें। 3. 🌹प्रकृति के साथ समय🌳: पेड़-पौधों के बीच टहलें या खुली हवा में बैठें। प्रकृति मन को सुकून देती है। 4. 🪻लिखना (जर्नलिंग)🌼: अशांति के कारणों को कागज़ पर लिखें। इससे विचार स्पष्ट होते हैं और मन हल्का होता है। 5. 🪔संगीत या भक्ति🌌: शांत संगीत, भजन या मंत्र सुनें। यह मन को तुरंत स्थिर करता है। 6. 🌟🌟सीमित स्क्रीन टाइम🤞: मोबाइल, टीवी या सोशल मीडिया से ब्रेक लें, क्योंकि ये अशांति बढ़ा सकते हैं। 7. 👏सकारात्मक सोच👏: अपने जीवन के अच्छे पहलुओं पर ध्यान दें। कृतज्ञता (ग्रैटिट्यूड) का अभ्यास करें, जैसे ...

शादी की रस्में क्या हैं? विवाह संस्कार क्या है

  शादी की रस्में क्या हैं? विवाह संस्कार क्या है   यदि कोई बुद्धिमान व्यक्ति विवाह योग्य आयु का हो जाता है, तो उसे कभी भी लड़की का सौंदर्य देकर विवाह का प्रस्ताव न दें।  शुद्ध आचरण वाली लड़की से शादी करें।  वर-वधू का स्वभाव कठोर नहीं होना चाहिए। कठोर वचन और वचन बोलने वालों से विवाह न करें।  शास्त्रों के अनुसार जन्म से ही अंगों से विवाह वर्जित है।  जिस लड़की के चेहरे पर मर्दों की तरह मूछों के निशान होते हैं।  वर का स्वभाव स्त्री जैसा होना चाहिए और स्त्री का स्वभाव पुरुष की कार से विवाह नहीं करना चाहिए।  लड़की की आवाज कौवे की तरह बहुत धीमी और कर्कश नहीं होनी चाहिए।  जिस लड़की की टखनों को ऊंचा उठाया जाता है और उसके पैर सपाट नहीं होने चाहिए, उसके हाथ और पैर भारी नहीं होने चाहिए।  लड़की की भौहें आपस में नहीं जुड़नी चाहिए।  किसके दांत आगे आते हैं और जिसके दाँत आगे की ओर निकले नही चाहिए।?  कन्या का संबंध माता पक्ष की पीढ़ी से और पिता की ओर से सातवीं पीढ़ी तक नहीं होना चाहिए। आपको अपने गोत्र, माता के कुल, दादा और दादी के कुल ...

परंपरागत अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार

                                       मानव जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रम होते है।ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं सन्यास होते है।शास्त्र के अनुसार चार अधिक महत्वपूर्ण है।मेरे निजी जीवन के अनुसार पांचवा आश्रम मनुष्य की संसार सागर से अलविदा होना होता है। आज महत्वपूर्ण विषय हैं अंतिम यात्रा और अन्तिम संस्कार है।आधुनिक युग में मनुष्य को यह ज्ञान नहीं होता हैं।अन्त काल में क्या क्या कर्म अनिवार्य है। मनुष्य अपनी दिनचर्या में इस बात को भूल जाता हैं कि हमे एक दिन संसार को छोड़कर चले जाना है।शिव लोक ,मोक्षकाल, इस स्थूल शरीर को त्याग कर शिव लोक मोक्षधाम को जाना होगा। भगवान कहते है कि मरणासन्न अवस्था में व्यक्ति को किस कारण से पृथ्वी पर सुलाया जाता हैं। उसके मुख में गंगा जल क्यों डाला जाता है।उसके नीचे कुश और तिल क्यों बिछाये जाते है। मृत्यु के दान एवं गोदान अष्ट महादान करवाया जाना चाहिए।सबसे प्रथम गोबर से भूमि को लीपना चाहिये।तदनन्तर जल की रेखा से मण्डल बनाना चाहिये तथा उसके मुख में गंगाजल डालना च...

गृहस्थ जीवन और सदाचार नियम का पालन करना

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  गृहस्थ जीवन और सदाचार नियम का पालन करना। प्रत्येक व्यक्ति को गृहस्थ जीवन का पालन अवश्य ही करना चाहिए।साधु और साधु वही हो सकता है जिसका दोष न हो।1.  सर्वप्रथम गृहस्थ व्यक्ति को ब्रह्म मुहूर्त में बिस्तर पर से उठ जाना चाहिए।  2. सर्वप्रथम धरती को स्पर्श कर प्रणाम करना चाहिए। 3.उसके बाद अपने हाथों को खोलकर उसके दर्शन करने चाहिए।देवी लक्ष्मी,सरस्वती और श्रीहरि वास करते हैं।4.फिर धरती माता का हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए। 5.उसके बाद थोड़ा चल कर मूत्र त्याग,शौच और लघुशंका आदि से निर्वित होने चाहिए।कभी नदी,मन्दिर, तीर्थ स्थल और पेड़ के नीचे , श्मशान घाट की भूमि पर मलमूत्र और शौच का त्याग नही करना चाहिए।निरोगी काया रखने के दिन में मुख के  उत्तर दिशा और रात्रि में दक्षिण दिशा में मुख करके मूत्र त्याग नही करना चाहिए।उसके बाद हाथों को साफ करना चाहिए।तीन बार कुल्ला करना ,मुँह धोये और पैर को भी धोना चाहिए। 6शुद्ध जल में स्नान करना चाहिए। उसके शुद्ध वस्त्र धारण करने के बाद अपने पितरों को और सूर्य देव को जल तर्पण करे। उसके बाद अपने पूजा घर या मंदिर में जा पूजा अर्चना एवं  ध्यान...